विवाह को जीवन का एक महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है, जो व्यक्ति को सामाजिक और आध्यात्मिक जिम्मेदारियों का पालन करने की प्रेरणा देता है। गृहस्थाश्रम के माध्यम से ही व्यक्ति देव, ऋषि, और पितृ ऋण से उऋण होकर अपने जीवन को सफल बनाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यदि वर या कन्या की कुण्डली में मांगलिक दोष हो, तो यह दाम्पत्य जीवन में विभिन्न समस्याओं का कारण बन सकता है। इन समस्याओं में वैवाहिक तनाव, संतान सुख में बाधा, और वैधव्य योग जैसी परिस्थितियाँ शामिल हो सकती हैं।
मांगलिक दोष के प्रभाव को शांत करने के लिए धर्मशास्त्रों में कुम्भ विवाह का विधान बताया गया है। कुम्भ विवाह में कन्या का विवाह भगवान नारायण या शालिग्राम भगवान के साथ शास्त्रोक्त विधि से कराया जाता है। इस प्रक्रिया में कन्या स्वयं को भगवान को समर्पित करती है और उनसे प्रार्थना करती है कि उनके वैवाहिक जीवन को सुखमय और समृद्ध बनाएं।
कुम्भ विवाह का मुख्य उद्देश्य वर और कन्या के जीवन से मांगलिक दोष के नकारात्मक प्रभाव को समाप्त करना है। इस अनुष्ठान से दाम्पत्य जीवन के समस्त दोष शांत होते हैं और वर-वधू के जीवन में सौभाग्य एवं शांति का संचार होता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार, कुम्भ विवाह दोषों के निवारण और जीवनसाथी के दीर्घायु एवं सुखमय जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण उपाय है।
कुम्भ विवाह से होने वाले लाभः
- कुम्भ विवाह के माध्यम से कन्या की कुण्डली में विद्यमान मांगलिक दोष, वैधव्य योग, विषकन्या योग जैसे अशुभ योगों का निवारण होता है।
- यह अनुष्ठान वर और कन्या के दाम्पत्य जीवन को सुखद एवं समृद्ध बनाता है, साथ ही पति-पत्नी के बीच परस्पर प्रेम और सामंजस्य को प्रोत्साहित करता है।
- कुम्भ विवाह के उपरान्त भविष्य में संभावित अशुभ घटनाओं का नाश होता है, और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- इस पूजन से दाम्पत्य जीवन में शान्ति, समृद्धि, और सौभाग्य का वास होता है।
- मांगलिक दोष के कारण उत्पन्न होने वाले अनिष्ट प्रभाव समाप्त होते हैं, जिससे दम्पति का जीवन दीर्घायु, सुरक्षित, और सुखमय बनता है।
- कुम्भ विवाह में होने वाले प्रयोग या विधि-
- स्वस्तिवाचन एवं शान्तिपाठ
- प्रतिज्ञा-सङ्कल्प
- गणपति गौरी पूजन
- कलश स्थापन एवं वरुणादि देवताओं का पूजन
- पुण्याहवाचन एवं मन्त्रोच्चारण अभिषेक
- षोडशमातृका पूजन
- सप्तघृतमातृका पूजन
- आयुष्यमन्त्रपाठ
- सांकल्पिक नान्दीमुखश्राद्ध (आभ्युदयिकश्राद्ध)
- नवग्रह मण्डल पूजन
- अधिदेवता, प्रत्यधिदेवता आवाहन एवं पूजन
- पञ्चलोकपाल,दशदिक्पाल, वास्तु पुरुष आवाहन एवं पूजन
- रक्षाविधान,
- प्रधान देवता पूजन
- पाठ विधान
- आरती


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